साक्षी स्वाद है संन्यास का (अष्‍टावक्र : महागीता - 59)

Never Born, Never Died - हिन्दी

08-03-2022 • 2 hrs 38 mins

अष्टावक्र उवाच।

क्व मोहः क्व च वा विश्वं क्व ध्यानं क्व मुक्तता।
सर्वसंकल्पसीमायां विश्रांतस्य महात्मनः।। 190।।
येन विश्वमिदं दृष्टं स नास्तीति करोति वै।
निर्वासनः किं कुरुते पश्यन्नपि न पश्यति।। 191।।
येन दृष्टं परं ब्रह्म सोऽहं ब्रह्मेति चिंतयेत्‌।
किं चिंतयति निश्चिन्तो द्वितीयं यो न पश्यति।। 192।।
दृष्टो येनात्मविक्षेपो निरोधं कुरुते त्वसौ।
उदारस्तु न विक्षिप्तः साध्याभावात्करोति किम्‌।। 193।।
धीरो लोकविपर्यस्तो वर्तमानोऽपि लोकवत्‌।
न समाधिं न विक्षेपं न लेपं स्वस्थ पश्यति।। 194।।
भावाभावविहीनो यस्तृप्तो निर्वासनो बुधः।
नैव किंचित्कृतं तेन लोकदृष्ट्‌या विकुर्वता।। 195।।
प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा नैव धीरस्य दुर्ग्रहः।
यदा यत्कर्त्तुमायाति तत्कृत्वा तिष्ठतः सुखम्‌।। 196।।

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